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Indigenous people Welfare Society (IPWS) के संस्थापक जनरल सेक्रेटरी प्रियव्रत नाग द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विशेष बातचीत…

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Indigenous people Welfare Society (IPWS) के संस्थापक जनरल सेक्रेटरी प्रियव्रत नाग द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विशेष बातचीत…

राँची :Indigenous people Welfare Society (IPWS) के संस्थापक जनरल सेक्रेटरी प्रियव्रत नाग द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विशेष बातचीत में
प्रियव्रत नाग ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनैतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए मनाया जाता है।

इसकी शुरुआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। उसके बाद से ही हम लगातार हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। पर्यावरण को बचाने में आदिवासी समाज का बहुत ही बड़ा योगदान है क्योंकि आदिवासी वो है जोप्रकृति की लय-ताल और संगीत का जो अनुसरण करता हो।

जो प्रकृति और प्रेम के आत्मीय संबंध और गरिमा का सम्मान करता हो।

जिसमें पुरखा-पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और इंसानी बेहतरी के अनुभवों के प्रति आभार हो ।

जो समूचे जीव जगत की अवहेलना नहीं करें।

जो धनलोलुप और बाजारवादी हिंसा और लालसा का नकार करता हो।

जिसमें जीवन के प्रति आनंदमयी अदम्य जिजीविषा हो।

जिसमें सृष्टि और समष्टि के प्रति कृतज्ञता का भाव हो।

जो धरती को संसाधन की बजाय मां मानकर उसके बचाव और रचाव के लिए खुद को उसका संरक्षक मानता हो।

जो हर तरह की गैर-बराबरी के खिलाफ हो।

जो भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और आत्मनिर्णय के अधिकार पक्ष में हो।

जो सहअस्तित्व, समता, सामूहिकता, सहजीविता, सहभागिता और सामंजस्य को अपना दार्शनिक आधार मानते हुए रचाव-बचाव में यकीन करता हो।

सहानुभूति, स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति जिसका प्रबल स्वर-संगीत हो।प्रकृति पूजक आदिवासिओ की संस्कृति और परम्परा महान है। हमारे पूर्वज भी महान थे क्यूंकि जो उनके सिद्धांत थे प्रकृति को ध्यान में रख कर बनाए गए थे जो आज ही दुनिया के सामने मिसाल है |
आदिवासिओ ने कभी प्रकृति को किसी भी तरह का कोई नुक्सान नहीं पहुचाया है, क्यूंकि आदिवासी हमेशा प्रकृति पूजक रहे है |

आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक-राजनितिक एवं कुटुम्ब व्यवस्था की अपनी अलग पहचान रही है। इन लोंगो में पर्यावरण वन-संरक्षण करने की प्रबल वृत्ति है। अतः वन एवं पर्यावरण वन्य-जीवों से उतना ही प्राप्त करते हैं , जिससे उनका जीवन सुलभता से चल सके और आने वाली पीढी को भी वन-स्थल धरोहर के रुप में सौप सकें। इन लोगों में पर्यावरण वन संवर्धन, वन्य जीवों एवं पालतू पशुओं का संरक्षण करने की प्रवृत्ति परम्परागतो है। इस कौशल दक्षता एवं प्रखरता के फ़लस्वरुप आदिवासियों ने पहाडॊं, घाटियों एवं प्राकृतिक वातावरण को संतुलित बनाए रखा। स्वतंत्रता से पूर्व समाज के विशिष्ट वर्ग एवं राजा-महाराजा भी इन आदिवासी क्षेत्र से छेड-छाड नहीं किया करते थे। लेकिन अग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों की परम्परागत व्यवस्था को तहस-नहस कर डाला, क्योंकि यूरोपीय देशों में स्थापित उद्दोगों के लिए वन एवं वन्य-जीवों पर कहर ढा दिया। जब तक आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक वातावरण में सेंध नहीं लगी थी, तब तक हमारी आरण्यक-संस्कृति बरकरार बनी रही। आधुनिक भौतिकवादी समाज ने भी कम कहर नहीं ढाया। इनकी उपस्थिति से उनके परम्परागत मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों का जमकर ह्रास हुआ है। साफ़-सुथरी हवा में विचरने वाले,जंगल में मंगल मनाने वाले इन भॊले भाले आदिवासियों का जीवन में जहर सा घुल गया है। आज इन आदिवासियों को पिछडेपन, अशिक्षा, गरीबी, बेकारी एवं वन-विनाशक के प्रतीक के सुप में देखा जाने लगा है। उनकी आदिम संस्कृति एवं अस्मिता को चालाक और लालची उद्दोगपति खुले आम लूट रहे हैं। जंगल का राजा अथवा राजकुमार कहलाने वाला यह आदिवासीजन आज दिहाडी मजदूर के रुप में काम करता दिखलायी देता है। चंद सिक्कों में इनके श्रम-मूल्य की खरीद-फ़ारोख्त की जाती है और इन्हीं से जंगल के पेडॊं और जंगली पशु-पक्षियों को मारने के लिए अगुअ बनाया जाता है। उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी की पीढी दर पीढी जिन जंगलों में वे रह रहे थे, उनके सारे अधिकारों को ग्रहण लग जाएगा। विलायती हुकूमत ने सबसे पहले उनके अधिकारों पर प्रहार किया और नियम प्रतिपादित किया कि वनॊं की सारी जिम्मेदारी और कब्जा सरकार की रहेगी और यह परम्परा आज भी बाकायदा चली आ रही है। आदिवासी की चिंता जल, जंगल, जमीन, भाषा और संस्कृति की है जो आदिवासी अस्मिता के लिए आवश्यक है। आदिम संस्कृति ही भारतीय संस्कृति की नीव है। आदिवासिओ की संस्कृति और सभ्यता महान थी महान है और महान रहेगी।आदिम समुदाय का बौद्धिक प्रकल्प प्रकृति की तरह विशाल है। कमी केवल विवेक, तर्कशील विश्लेषण और अभिव्यक्ति में है। आदिवासी ना आस्तिक है , ना नास्तिक है , वह तो सिर्फ वास्तविकता में विश्वास रखता है , इसलिए बस इसे समझने की जरुरत है ।
हम आदिवासी लोग जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज यानी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं तो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि यह संघर्ष सम्पूर्ण मानव जीवन और प्रकृति को बचाने के लिए है। आज जंगल सिर्फ आदिवासी इलाकों में क्यों बचा हुआ है? क्योंकि आदिवासी को यह बात अच्छी तरह से पता है कि अगर प्रकृति नहीं तुम मानव जाति का अस्तित्व नहीं और यह बात आदिवासियों के साथ साथ तमाम लोगों को भी समझना होगा क्योंकि जंगलों के बर्बाद होने से या प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन करने से सिर्फ आदिवासियों का नुकसान नहीं होने वाला इससे समस्त मानव जाति का नुकसान होगा ।
लोग अक्सर विभिन्न माध्यमों से जैसे कि टीवी न्यूज़ चैनल सोशल मीडिया आदि के माध्यम से यह बात जरूर आदिवासियों के द्वारा सुना होगा “जल जंगल जमीन बचाओ” कभी इसके बारे में सोचा है यह 3 शब्दों का क्या अर्थ है यह तीन शब्द पूरी प्रकृति को परिभाषित करती है एवं इस संसार में जितने भी जीव जंतु हैं उनका आधार बताती है आदिवासी समाज शुरू से ही प्रकृति से जुड़ा हुआ है इसीलिए उनके जितने भी अनुष्ठान वगैरह उसमें स्पष्ट झलकता है कि उनका प्रकृति से कितना गहरा लगाव है जैसे कि सरना वृक्ष का पूजा करना पहाड़ों का पूजा करना नदियों का पूजा करना साथ में पृथ्वी एवं पूरे ब्रह्मांड का पूजा करना शामिल है आदिवासियों के जीवन शैली सतत विकास किस सिद्धांत पर आधारित है इसलिए आदिवासी लोग प्रकृति से जितना जरूरत है उतना ही लेते हैं और यह पीढ़ियों से चला आ रहा है इसी कारणवश आज भी आदिवासी समाज के लोग ज्यादा धन संचय में विश्वास नहीं रखते और यह चीज आज के हिसाब से बहुत ही आवश्यक है इन्हीं सारी चीजों को देखते हुए आज पूरी दुनिया प्रकृति को बचाने के लिए आदिवासी मॉडल की बात करती है क्योंकि दुनिया को पता है आदिवासियों का तरीका बहुत ही कारगर तरीका है।
साथ ही हम पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान दे सकते हैं जैसे कीपर्यावण विभिन्न तत्वों का संरक्षण -:

  1. मृदा संरक्षण:

मृदा अथवा भूमि के संरक्षण से हमारा तात्पर्य भूमि व मृदा के अपरदन को रोकना है । वर्तमान कृषित भूमि की उपजाऊ शक्ति में किसी भी प्रकार की कमी न आने देना है, बल्कि साथ-साथ उसमें अपरदन क्रो रोकना है । भूमि अपरदन की गति को निम्न उपायों द्वारा धीमा किया जा सकता है, व कहीं-कहीं उसे पूरी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है ।

(i) वनारोपण करना:

भूमि को अपरदन से बचाने के लिए वनों का विस्तार करना काटने योग्य वृक्षों को समूल न काटना जैसे कदम उठाना आवश्यक हो गया है, वृक्षारोपण मृदा अपरदन रोकने के साथ जल बहाव पर नियंत्रण तथा जलवायु में नमी की मात्रा को बढ़ाने में मदद देता है । मृदा को संगठित करने में इसका विशेष योग होता है ।

यदि वनों का विस्तार किया जाए तो पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखा जा सकता है । यह पौधे मृदा को जीवाँश प्रदान करके उसकी उपजाऊ शक्ति को बढ़ा रहे हैं । यह जीवांश मृदा की जल सोखने की शक्ति को भी बढ़ा देते हैं, जैसे जल के बहाव की तीव्रता कम हो जाती है, तथा ऐसी भूमि पर यदि कोई उत्पादन किया जाता है तो उसको जल की का आवश्यकता पड़ती है ।

(ii) पशुचारण को नियन्त्रित करना:
जीव जन्तुओं की संख्या का एक बहुत बड़ा भाग अपने आहार के लिए पौधों पर निर्भर करता है । कुछ जन्तु घास खाते हैं, कुछ जन्तु खरपतवार खाते है, कुछ जन्तु झाडियों से अपना भोजन प्राप्त करते है, तो कुछ जन्तु पौधों को नष्ट करते है, विशेष रूप से भेड़-बकरी अनेक दुधारू पशु गाय, भैंस के घास चरने से भूमि कुचली जाती है, जिसमें जड़ें खुल जाती हैं, तथा मिट्‌टी ढीली पड़ जाती है और इसमें भूमि का अपरदन होता है ।

अत: आवश्यक है कि पशुओं के चरने को इस तरह नियन्त्रित किया जाए, कि वे भूमि का अपरदन भी न करें तथा पौधे खाकर अपना आहार भी प्राप्त कर सकें । जिन स्थानों पर भूमि अपरदन अधिक होता है, उन स्थानों पर पशुओं का चरना प्रतिबन्धित होना चाहिए । पर्वतीय दालों पर ऐसी ढोल बनाई जाए, जिसमें पशुओं द्वारा पौधों के खाने पर भूमि का अपरदन यदि हो तो मिट्टी वहां से हटकर अन्यत्र नहीं जाए ।

(iii) समोच्च रेखीय जुताई:

ढ़ाल के अनुसार भूमि को न जोता जाए बल्कि दाल को काटकर सीढ़ीनुमा खेत बनाएँ जाएं और इस प्रकार समोच्च रेखीय जुताई की जाए । यह जुताई पर्वतीय भागों में की शिखर से नीचे की ओर समकोण बनाते भूमि का अपरदन भी कम हो जाता है व जल के बहाव को आवेग भी मंद रहता है

(iv) बाढ़ नियंत्रण:

नदियों में बाढ़ नियंत्रण हेतु उनकी घाटियों में बांध बाँधना और विशाल जलाश्य बनाना । इनके द्वारा जल बहाव पर नियंत्रण रहता है तथा भूमि का अपरदन रुक जाता है । इस संचित जल का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर किया जा सकता है ।

(v) परती भूमि:

कृषित भूमि को परती भूमि के रूप में कम से कम छोड़ी जानी चाहिए । खाली पड़ी भूमि पर अपरदन की मात्रा अधिक रहती है ।

(vi) फसल प्रत्यावर्तन:

एक ही भूमि पर फसलों को हेरफेर करके बोने पर भूमि की उर्वरता भी बनी रहती हैं, तथा साथ-साथ उसका अपरदन भी नहीं होता है । क्योंकि इस प्रकार भूमि में से कुछ विशेष तत्व कुछ फसलें अधिक मात्रा में ग्रहण का लेती है, तथा कुछ फसलें भूमि को इन तत्वों की पूर्ति करने में मदद देती हैं । अत: फसलों को उचित अदला बदली करके बोया जाए तो भूमि की उर्वरता भी बनी रहती है, और उसका अपरदन भी रूक जाता है ।

(vii) मरूस्थल का विस्तार रोकना:

मरूस्थलों को रोकने के लिए वनों की अनेक कताई लगाई जाएं । इसके द्वारा हवाओं की तीव्रता को कम किया जा सकता है । जिसमें उनकी रेत को दूर तक उड़ा ले जाने की क्षमता कम हो जाती हैं । जब यह रेत उपजाऊ भूमि पर एकत्र होने लगती है, तब उसकी उर्वरा शक्ति कम होने लगती हैं । हमारे देश में विशेष रूप से हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश राज्यों से सटे राजस्थान के सीमावर्ती भाग इस प्रकार की समस्या से पीड़ित है, अत: मरूस्थल के विस्तार को इन क्षेत्रों में रोकने के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है ।

(viii) भूमि की उपजाऊ शक्ति एक सदैव एक सी रखने के लिए उसमें खाद व उर्वरक का समुचित मात्रा में उपयोग करना ।

(ix) स्थानान्तरण कृषि:

इन क्षेत्रों को स्थायी कृषि क्षेत्रों में बदलना ताकि इस प्रकार की कृषि के लिए वनों को बेकार में न काटा जाए । इससे भूमि अपरदन के साथ-साथ वन ह्रास को रोका जा सकता ।

  1. जल संरक्षण:

जल ही जीवन है, अत: जल का संरक्षण अति आवश्यक है ।

इस सम्बन्ध में निम्न बातों पर ध्यान दिया जा सकता हैं:

(i) प्रत्येक गांव में तालाब अवश्य होने चाहिए जिनमें वर्षा के जल को एकत्रित किया जा सके । इस जल का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर अनेक कामों में किया जा सकता है ।

(ii) नदियों पर छोटे-छोटे बांध व जलाश्य बनाये जाने चाहिए । इससे अतिरिक्त जल को एकत्र करके आवश्यकता पड़ने काम में लाया जा सकता है । इन बांधो पर विद्युत भी उत्पादित की जा सकती है ।

(iii) नदियों में प्रदूषित जल को डालने से पूर्व उसे साफ करके डाला जाए, ताकि नदियों का जल स्वच्छ बना रहे ।

(iv) जल प्रवाह की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए । कस्बों, नगरों में दूषित जल के निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ।

(v) जल का व्यर्थ न गँवाना एवं पदूषित न होने देना भी संरक्षण के लिए आवश्यक है ।

(vi) भूमिगत जल का उपयोग उनकी समय उपलब्धता के आधार पर किया जाए । धरातलीय जल की अनुपस्थिति में इस जल को काम में लाया जाए ।

  1. पर्वतीय क्षेत्र और पर्यावरण संरक्षण:

जनसंख्या के बढ़ते दबाव तथा खनिज संसाधनों के अन्धाधुन्ध दोहन से पर्यावरण की अनेक समस्याओं का सामना पर्वतीय क्षेत्रों को करना पड़ रहा है । भू-स्खलन और भू-कटाव के रूप में वहां के पर्यावरणीय आधार का तेजी से हास हो रहा है । पर्वतीय विकास और पर्यावरण में तालमेल होना चाहिए तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वहां के लोगों की भागीदारी इसमें अवश्य रहे ।

पर्यावरण संतुलन के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, एकीकृत जलागम प्रबन्धन, भूमि एवं जल संरक्षण, वनों का वैज्ञानिक प्रबन्धन, पर्यावरण संरक्षण हेतु शोध एवं पर्यावरण शिक्षा, जनजागरूकता पारिस्थितिकी विकास, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्याँकन आदि कार्यक्रमों को बढावा दिया जाना चाहिए ।

पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण के समय पर्यावरण पर ध्यान चाहिए । मोटर मार्गों के बजाए हल्के वाहन मार्ग पैदल मार्ग तथा पुल मार्ग आदि के समन्वित निर्माण पर्यावरण को हानि पहुंचाए बिना बनाए जाए तथा सडकें बनाते समय स्थानीय पर्यावरण की वाहक क्षमता का ध्यान अवश्य रखा जाए ।

प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धि के साथ ही पर्यावरण की रक्षा में वनों की विशेष भूमिका है । वन पर्वतीय क्षेत्र के आर्थिक विकास के मुक्त स्त्रोत भी है । कच्चा माल, ईधन प्रदान करने, भूरक्षण रोकने, पर्यावरण की सुरक्षा करने तथा मैदानी क्षेत्रों को बाढ़ से बचाने के महत्वपूर्ण कार्य पर्वतीय क्षेत्र के वन करते है ।

अत: पर्वतीय भू-भाग का 60 प्रतिशत भाग वन क्षेत्र होना चाहिए । एक हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित पेड़ों की व्यापारिक कटान पर रोक लगाई जाए । वन्य जन्तु तथा वनों का विनाश रोकने, जैविक विविधता बनाये रखने, भारी पैमाने पर वनीकरण करने, वन सम्पदा के बढ़ाने आदि को महत्व दिया जाए ।

यहाँ पर ऐसे उद्योगों के विकास पर बल दिया जाए, जो पर्यावरण असन्तुलन भी पैदा न करें और लोगों का जीवन स्तर भी ऊँचा उठ सके । इलैक्ट्रानिक्स उद्योग, लघु एवं कुटीर उद्योग तथा हाथकरघा उद्योग इस दृष्टि से अधिक उपयोगी हो सकते हैं ।

  1. परिवहन एवं पर्यावरण संरक्षण:

जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के साथ वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती जा रही है । इससे निकलने वाला धुंआ पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है ।

जिसको निम्न उपायों द्वारा रोका जा सकता है:

(i) धुँआ उगलने वाले परिवहनों की वृद्धि को रोका जाये ।

(ii) परिवहनों के धुएँ की माप धुँआ मीटर, से की जाये ।

(iii) वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम का सख्ती से पालन कराया जाये ।

(iv) सड़कों पर पेड़ लगाए जाएँ । यद्यपि इसका असर प्रदूषण पर सीमित ही पड़ेगा ।

(v) परिवहन साधनों में बसों, ट्रकों, मोटरों, स्कूटरों आदि में शोर शमन यंत्र (Silencer) ठीक काम करते है या नहीं इसकी पूरी देख रेख की जाये । शोर मचाने वाले वाहनों को चलन में लाने से रोक दिया जाये ।

(vi) अनिवार्य स्थिति में ही वाहनों को हार्न बजाने की अनुमति दी जाए ।

(vii) विविध प्रकार के हार्न का बढ़ता उपयोग रोका जाये ।

  1. जीव जन्तुओं एवं समुद्री दोहन का संरक्षण:

जीव जन्तुओं की विभिन्न नस्लों के संरक्षण के लिए उनके प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित किया जाए । इसके लिए वनों का होना आवश्यक है । इस प्रकार प्रत्येक प्रकार के जीव अपना विकास कर सकते है । इसलिए इन जन्तुओं के शिकार पर रोक लगाई जाए, वनों को काटने से रोका जाए, वनों के क्षेत्र को बढ़ाया जाए आदि ।

समुद्रों के जल में दिन-प्रतिदिन प्रदूषण बढ़ता जा रहा है । इस जल में तेल के मिलने, कारखानों का प्रदूषित जल को गिराने आदि के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है । इसके दुष्प्रभाव से समुद्री जल से मछलियों की प्रजनन शक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । उनकी संख्या भी घट रही है, तथा उनका शरीर भी अम्लीय हो रहा है, जो लोगों का आहार बनकर उनको नुकसान पहुँचा रहा है । अत: आवश्यक है कि समुद्रों के जल को प्रदूषित होने से रोका जाए ।

  1. वनों का संरक्षण:

किसी भी देश के पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए कम से कम 33 प्रतिशत भाग वन आवरण होना चाहिए । भारत का यह वन क्षेत्र मात्र 64 लाख हैक्टेयर अर्थात मात्र 19.4 प्रतिशत रह गया है । भारत की अर्थव्यवस्था में अभी तक वनों ने कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दिया है परन्तु भविष्य में अति आवश्यक है कि वन संसाधन का विस्तार एवं संरक्षण वैज्ञानिक तथा सही व्यवस्था के द्वारा किया जाये ।

आज भारत में वर्तमान वन संसाधन को संरक्षण प्रदान करने की जरूरत है तथा क्षेत्र के विस्तार को अविलम्ब बढ़ाये जाने की आवश्यकता है । हमारी गलत एवं त्रुटिपूर्ण वन-नीतियों ने जो विनाश किया है उसकी भरपाई किया जाना बहुत जरूरी है ।

इस हेतु निम्न उपाय किए जाने आवश्यक हैं:

(i) वनों की रक्षा के लिए सरकारी नियम बनने चाहिए तथा उनका कठोरता से पालन होना चाहिए ।

(ii) केन्द्र सरकार को प्रदेश सरकारी के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में वनों के विस्तार के लिए निश्चित क्षेत्र का लक्ष्य रखने को कहना चाहिए ।

(iii) जनता का ध्यान पर्यावरण के संरक्षण में वनों की उपयोगिता पर दिया जाना चाहिए ।

(iv) सामाजिक वानिकी को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए । जिससे प्रत्येक घर में कम से कम एक वृक्ष लगाना आवश्यक हो तथा मनुष्य खाली स्थानों पर वृक्षारोपण करें ।

(v) वन अपराधियों के लिए कठोर दण्ड-नियम बनाये जायें जिससे वनों का गैर कानूनी कटान रोका जा सके ।

(vi) वनों के प्रति जनता को नया दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे वे वनों को राष्ट्रीय सम्पदा मानकर उनके विकास एवं संरक्षण में सहयोग करें ।

(vii) वन क्षेत्रों की देखभाल प्रशिक्षित कर्मचारियों के द्वारा की जानी चाहिए ।

(viii) वैज्ञानिक वन व्यवस्था एवं बन उपजों के उपयोग को आर्थिक संरक्षण दिया जाना चाहिए ।

(ix) वृक्षों के प्रकार एवं उपयोग के लिए अनुसंधान किये जाने चाहिए, जिससे गौण उपयोग में अच्छी किस्म की लकड़ी का दुरूपयोग न हो ।

(x) वन रक्षण में वनों के काटने के वैज्ञानिक तरीकों के प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए ।

(xi) वनों के विकास में युवा मानव संसाधन जैसे राष्ट्रीय सेवा योजना राष्ट्रीय कैडेट कोर स्काउट एवं अनेक समाजसेवी संस्थाओं का सहयोग लिया जाना चाहिए ।

(xii) वन संरक्षण को सरकारी संचार माध्यमों पर विशेष ध्यान देकर जन चेतना जाग्रत की जानी चाहिए ।

(xiii) वन महोत्सव, विश्व वानिकी दिवस, पर्यावरण दिवस अथवा अनेक राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय महत्वपूर्ण दिवसों पर वहत स्तर पर वृक्षारोपण, वृक्ष सेवा, वृक्ष संरक्षण कार्यशाला, श्रमदान अथवा संकल्प कार्यक्रम किये जाने चाहिए ।

(xiv) भारत के केन्द्रीय वन मण्डल, वन अनुसंधान संस्थान, वन अध्ययन आदि संस्थाएं वन विकास, सरंक्षण एवं शोध कार्य कर वनों के विकास में विशेष योगदान दे रही हैं । ये संस्थान अनेक प्रकार के संकर वृक्षों, कीटनाशक दवाओं आदि पर खोज कर वन विज्ञान को नया जीवन एवं दिशा प्रदान कर रही है ।
अतः मैं इस पृथ्वी वासी होने के नाते अपने तमाम मानव साथियों से अपील करना चाहता हूं कि साथियों जाग जाओ कहीं बहुत देर ना हो जाए ! जोहार बहुत-बहुत धन्यवाद।।

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