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150 साल पहले झारखंड से चाय बागान क्षेत्रों में लेकर बसाये गये 50 लाख झारखंडी आदिवासी की अब उठी मांग नागरिकता देने की, पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने की मांग रखी

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150 साल पहले झारखंड से चाय बागान क्षेत्रों में लेकर बसाये गये 50 लाख झारखंडी आदिवासी की अब उठी मांग नागरिकता देने की, पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने की मांग रखी

जमशेदपुर :150 साल पहले झारखंड से चाय बागान क्षेत्रों में लेकर बसाये गये 50 लाख झारखंडी आदिवासी की अब उठी मांग नागरिकता देने की, पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने की मांग की है

देश में एनआरसी और सीएए को लेकर चल रहे बवाल के बीच एक मुद्दा झारखंडी आदिवासियों की अस्मिता का भी उठाया गया है. यह मुद्दा उठाया है आदिवासी नेता और झारखंड जदयू के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने. श्री मुर्मू ने इस गंभीर मुद्दा को लेकर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को त्राहिमाम पत्र भेजा है. इसमें उन्होंने बताया है कि बोडो उग्रवादियों के साथ शांति-समझौता के नाम पर 27 जनवरी 2020 को दिल्ली में भारत के गृहमंत्री, असम के मुख्यमंत्री और अनेक बोडो संगठनों ने समझौते में हस्ताक्षर किया. मगर दूसरे ही दिन विरोध में गैर-बोडो संगठनों ने असम बंद किया. चूँकि बोडो टेरिटोरियल कौंसिल (बीटीसी) क्षेत्र में बोडो आबादी गैर-बोडो आबादी की तुलना में अल्पमत है, अर्थात लगभग 30 फीसदी है और गैर-बोडो आबादी में झारखंडी आदिवासी आबादी एक बड़ी आबादी है. उन्होंने बताया कि 27 जनवरी 2020 के तथाकथित शांति-समझौता में झारखंडी आदिवासी आबादी, जो पूरे असम में 50 लाख से ज्यादा है, के हितों की कोई चर्चा और चिंता नहीं की गयी. जो असम के भीतर एक प्रताड़ित आबादी के रूप में चिन्हित की जा सकती है. यह आबादी अंग्रेजों द्वारा वृहद् झारखंड क्षेत्र (ओड़िशा, बंगाल और झारखंड मिलाकर) से 150 वर्षों पूर्व जबरन असम चाय की खेती के नाम पर ले जाया गया था. मगर अब तक न इन्हें आदिवासी (एसटी) का दर्जा प्राप्त है, न असम के रहने वाले ही मान्य है. वे लोग दोयम दर्जे के कुलि के रूप में ये जीने को मजबूर हैं. देश की आजादी और एक संविधान के बावजूद इन्हे अन्याय, अत्याचार का दंश झेलना पड़ रहा है. वर्ष 1996 वर्ष से बोडो-संथाल जातीय दंगों का दौर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जारी है. 24 नवम्बर 2007 को लक्ष्मी उरांव को असम की राजधानी में सरेआम नंगा कर घुमाया गया-कोई जाँच का नतीजा सामने नहीं आया. वर्त्तमान में असम में भाजपा सरकार ने चुनाव पूर्व इन्हे एसटी का दर्जा देने की घोषणा कर ठग दिया. अब असम हाइकोर्ट ने हाल में निर्देश जारी कर दिया है कि आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी जमीन पर कोई भी गैर-आदिवासी निवास नहीं कर सकता है. इसका सीधा प्रतिकूल असर 50 लाख झारखंडी आदिवासियों पर पड़ने वाला है. असम के झारखंडी आदिवासियों के जनजीवन की रक्षार्थ कई बार भारत के संसद में बतौर सांसद सालखन मुर्मू ने खुद आवाज़ उठाई थी और भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के साथ 9 दिसंबर 2003 को असम के प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात कर उनको एसटी बनाने और न्याय दिलाने का गुहार लगाया था, मगर बेकार साबित हुआ. श्री मुर्मू ने कहा है कि जब भारत सरकार बढ़-चढ़कर पड़ोसी देशों के प्रताड़ित आबादी को देश में नागरिकता प्रदान कर न्याय देना चाहती है तो देश के भीतर असम प्रदेश में प्रताड़ित हो रहे झारखंडी आदिवासियों को अविलम्ब एसटी का दर्जा प्रदान कर न्याय प्रदान करें अन्यथा भारत सरकार, असम सरकार और झारखण्ड सरकार मिलकर उन लगभग 50 लाख झारखंडी आदिवासियों को झारखण्ड की उपनागरिकता प्रदान करें. झारखंड सरकार चाहे तो झारखण्ड वापस लाकर उनका पुनर्वास करें अन्यथा वे असम ही नहीं भारत की नागरिकता से भी वंचित हो सकते हैं

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