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हमारी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने का कोई स्पष्ठ नीति या सूत्र केंद्र सरकार के पास नहीं है : राजीव रंजन प्रसाद

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हमारी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने का कोई स्पष्ठ नीति या सूत्र केंद्र सरकार के पास नहीं है : राजीव रंजन प्रसाद

राँची : वित्तमंत्री की प्रेस कांफ्रेंसों की श्रृंखला के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि देश की मौजूदा स्थिति को सुधारने का और हमारी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने का कोई स्पष्ठ नीति या सूत्र केंद्र सरकार के पास नहीं है। उक्त बातें प्रतिक्रिया स्वरूप प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा ।

उन्होंने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने जो घोषणाएं की थी, एक बड़े नाटकीय अंदाज में, इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं था , कांग्रेस पार्टी ने स्वागत भी किया था 20 लाख करोड़ का। उन्होंने कहा था कि 10 प्रतिशत भारत की जीडीपी को एक इकॉनमिक पैकेज के रुप में दिया था। उसके बाद से वित्तमंत्री जी की निरंतर प्रेस कांफ्रेंस हुई हैं, उससे एक बात स्पष्ट है कि माननीय प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री जी ने एक फर्क तो नहीं समझा कि कर्जा चाहे वो किसान का हो चाहे वो स्ट्रीट वेंडर को दिया जाए, चाहे एमएसएमई को दिया जाए, ऋण-ऋण होता है, क्रेडिट-क्रेडिट होता है, उसको आप फाइनेंशियल सपोर्ट या स्टिमुलस नहीं कह सकते। कोई भी अर्थशास्त्र का ज्ञानी इसको स्वीकार नहीं करेगा।

दुनिया के अन्य देशों में जहाँ स्टिमुलस दिया गया है। चाहे वो जर्मनी ने दिया, यूके ने दिया, फ्रांस ने दिया, इटली ने दिया, वो सही मायने में इंकम सपोर्ट और वेज सपोर्ट है। कुछ बुनियादी बात है कि इस लॉकडाउन के बाद, जो अर्थव्यवस्था में शिथिलता आयी है, लगभग सवा 14 करोड़ लोगों का रोजगार खत्म हुआ है। फैक्ट्रीज बंद हुई हैं, लोगों की दुकानें बंद हुई हैं lockdown जरूरी था क्योंकि इसके वायरस के स्प्रेड को रोकना आवश्यक था, इसलिए राज्यों ने भी समर्थन किया, सबने समर्थन किया। हम आज भी उसको चुनौती नहीं दे रहे। इसलिए यह बताना जरुरी हो जाता है कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने जो आश्वासन दिया था, राहत पैकेज की बात कही थी उसमें इंकम सपोर्ट और वेज सपोर्ट नहीं दिखता है ।

प्रधानमंत्री के द्वारा यह आदेश दे दिया गया कुटीर, लघु और मध्यम उद्योगों के कर्मचारियों को, वर्कर्स को, पूरा वेतन दिया जाए, बिना किसी उत्पादन के, बिना किसी बिक्री के, वो न्यायोचित नहीं था। इसलिए क्योंकि इसमें सरकार को इसमें पैसा देना चाहिए था। फाइनेंशियल सपोर्ट, कर्जे की सिर्फ गारंटी हो और जीरो परसेंट इंट्रेस्ट की कांग्रेस पार्टी ने मांग भी की थी, एमएसएमई को फाइनेंस दिया जाए, पैसा दिया जाए, ताकि वो वर्कर्स की, कर्मचारियों की तनख्वाह दे सके, बिना किसी नुकसान को उठाए।

उसके साथ-साथ जो हमारे देश में साढ़े 14 करोड़ के लगभग माइग्रेंट वर्कर्स (प्रवासी मजदूर )हैं, वित्तमंत्री ने परसों स्वयं माना था कि लगभग साढ़े 8 करोड़ अभी भी ट्रैप्ड हैं, अभी भी शहरों में औऱ रास्तों में फंसे हुए हैं, अभी भी घर नहीं पहुंच पाए और काफी कठिनाइयों का उन्होंने सामना किया है। इस पीड़ा को उन्होंने स्वयं निमन्त्रण नहीं दिया था, अचानक लॉकडाउन बिना तैयारी के हुआ, रेलगाड़ी बंद, बसें बंद हो गईं, उससे तकलीफ हुई। न उनके पास कोई साधन था। चाहे वो अर्बन गरीब हैं, चाहे माइग्रेंट लेबर हैं। वित्तमंत्री जी ने अबकी बार अगर ये कहा कि माईग्रेंट लेबर को या अर्बन गरीब को राशन दिया जाएगा और एक किलो दाल ये कोई अहसान नहीं है, पहले तो हर गरीब का, हर उस नागरिक का, जो क्वालिफाई करता है, क्राईटेरिया नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट में अधिकारी है। इस बात से काफी आश्चर्य हुआ कि माननीय वित्तमंत्री कहती हैं कि राज्यों को हमने कह दिया, अनाज दे दिया है। कोई अहसान नहीं है। ये अनाज,चावल है, इसमें दालें हैं, क्यों एफसीआई के गोदामों में भारत की जनता का अनाज है, वो कानून के मुताबिक उनको देना बनता है, खासतौर पर ऐसी परिस्थिति में जब लोगों का रोजगार और आमदनी बिल्कुल खत्म हो गई हो, माईग्रेंट लेबर जा रहे हैं, वित्तमंत्री ने कहा कि उनको पका हुआ खाना तीन टाइम का मिलता है, उनको पहले इसकी जांच परख कर लेनी चाहिए कि वास्तविकता क्या है। वास्तव में तस्वीर ऐसी होती तो स्थिति इतनी भयावह नही होती लोग भूख से मर नही रहे होते ।

उन्होंने कहा जहाँ तक प्रश्न है, पैसा लोगों के हाथ में कितना गया? जब तक गरीब के हाथ में, मजदूर के हाथ में, श्रमिक के हाथ में मनी ट्रांस्फर नहीं होगा, हम उसको किसी भी तरह का स्टिमुलस मानने को कांग्रेस पार्टी तैयार नहीं है।
वित्तमंत्री ने आज भी दोहराया कि पीएम किसान योजना की पहली खेप में 16 हजार करोड़ से ज्यादा पैसा दिया गया और दूसरी खेप में भी इसी तरह से पैसा दिया जाएगा, वो फाइनेंशियल पैकेज का पैसा नहीं है, वो पिछले साल चुनाव से पहले पीएम किसान योजना की घोषणा हो चुकी है, उसको बजट की स्वीकृति पार्लियामेंट से मिल चुकी है, पिछले बजट में भी और इस बजट में भी और अगर हम उसको मान भी लें, तो उसके साथ-साथ, जो वृद्ध लोगों को, महिलाओं को, जो गरीब महिलाएं हैं, जिनको पेंशन दी गई है, 500 रुपए महीना। इसमें दो बुनियादी सवाल हैं, केवल 21 प्रतिशत महिलाओं का जनधन अकाउंट है। बेहतर ये होता कि ये जो पैसे की मदद देनी थी, वो कह रहे हैं डायरेक्ट बेनिफिट ऑफ ट्रांस्फर (डीबीटी) से, तो उसको मनरेगा के अकाउंट में दिया जाना चाहिए था, जो ज्यादा मजबूत है, 21 प्रतिशत महिलाओं तक ये पैसा पहुँच जाए और ये 500 रुपए का मानें, 7 डॉलर है। संयुक्त राष्ट्र संघ में, जो पावर्टी वेज थी, एक दिन के गरीबी के वेज की जो व्याख्या है, वो ढाई डॉलर है, वो 75 डॉलर करनी चाहिए थी महीने की, यानि कि लगभग 6 हजार रुपए, कांग्रेस पार्टी ने तभी कहा था कि सात हजार रुपए और दूसरी संस्थाओं ने भी कहा, कांग्रेस पार्टी ने भी मांग की है, कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी ने और राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी मांग कि है कि ये पैसा दिया जाए।

माननीय प्रधानमंत्री जी ने हिम्मत नहीं दिखाई।कांग्रेस पार्टी ने उनसे आग्रह किया था कि अगर आपको सही मायने में मदद पहुंचानी है और जिससे देश का हौसला बढ़े, हमारा चाहे वो उद्योग है, छोटे व्यवसाई हैं, वो हिम्मत से दोबारा आएं, उसके लिए आपको दो चीजों की चिंता नहीं करनी चाहिए। फिस्कल डेफिसेट की यानि कि वित्तीय घाटे की, जो होगा, कि जीडीपी शायद शून्य के पास चली जाए, इसको हमको स्वीकार करना पड़ेगा और दूसरा इंफ्लेशन। इसलिए सरकार को चाहे वो बॉन्ड्स के माध्यम से उन्होंने कर्जा लिया है, सवा चार लाख करोड़ बढ़ाया है वो पर्याप्त नहीं है। सरकार को बॉन्ड्स के माध्यम से और पैसा उठाना चाहिए और बाकी जो बच जाए, उसको मॉनेटाइज करना चाहिए।
किसान को पैसा नहीं दिया उल्टा उसको कहा कि कर्जा और ले लो, उसकी व्यवस्था हम करेंगे। जो बिल्कुल टूट रहे हैं गरीब लोग, उनको और कर्जा लेने को कहा था और साथ में स्ट्रीट वेंडर्स, ये तमाम, जो कर्जों की लंबी लिस्ट है, वो फिस्कल स्टिमुलस और इकॉनमिक पैकेज नहीं है ।
जहाँ तक मनरेगा का सवाल है, इसलिए भी आवश्यक हो गया था 40 हजार करोड़ क्योंकि लोगों के पास काम नहीं है, और जो हमारे प्रवासी मजदूर हैं, वो वापस लौट रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की ये मांग रहेगी इस सरकार से कि वो सुनिश्चित करें कि लगभग 200 दिनों, जैसा कि राहुल जी ने भी कल कहा, का काम हर मजदूर को मनरेगा में मिले और 300 रुपया दिहाड़ी, पगार एक दिन की तय की जाए। जो परसों घोषणा हुई थी, 20 रुपया बढ़ाने की वो एक क्रूर मजाक था गरीबों के साथ। ये तो बजट में कह दिया गया था, ये लॉकडाउन के बाद और इस संक्रमण के बाद भी कोई एक पैसा नहीं बढ़ाया गया। जो मनरेगा की पगार है, जो मनरेगा वेजेस है, उसमें सरकार को संवेदनशील होना चाहिए और उसको तुरंत मानना चाहिए उसमें एकरूपता लाना चाहिए ।

प्रदेश प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि ये जो घोषणाएं है, उनका गरीब से, मजदूर से, किसान से, छोटे, जो व्यवसाय करने वाले हैं, लघु और कुटीर उद्योग हैं, उनसे कोई संबंध नहीं है। यहाँ अभी प्राथमिकता होनी चाहिए कि जो हमारे प्रवासी मजदूर हैं, उनको उनका अधिकार मिले, वो भारत के नागरिक हैं, वो कोई दया के पात्र नहीं है, करुणा के पात्र नहीं हैं, उनका संवैधानिक अधिकार है, कानूनी अधिकार है, इसका सम्मान होना जरुरी है।

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