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सोशल डिस्टेंसिंग आदिवासियों की है परंपरा, Covid-19 से बचने के लिए मजबूरी नहीं

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सोशल डिस्टेंसिंग आदिवासियों की है परंपरा, Covid-19 से बचने के लिए मजबूरी नहीं

जमशेदपुर: कोरोना वायरस का कहर पूरे विश्व में जारी है. सरकार अपने अस्तर से कोरोना वायरस से बचने के लिए लोगों को आगाह और जानकारी उपलब्ध करा रही हैं. जिससे लोगों को कोरोना वायरस का संक्रमण में न हो. कोरोना वायरस से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को ही मुख्य हथियार है. इसीलिए सरकार ने देश में लॉकडाउन लागू कर दिया है.
घाटशिला में आदिवासी समाज के संथाल समुदाय और आदिवासी समुदाय के लोग सोशल डिस्टेंसिंग को बखूबी से निभा रहे हैं. दरअसल, आदिवासी समाज के संथाल समुदाय में सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व आज से नहीं बल्कि यह पारंपारिक और सदियों से चली आ रही है. सरकार लोगों को दूरी बनाकर रखने का आदेश दे रही है. लेकिन आदिवासी समाज में यह प्राचीन काल से चलता आ रहा है.देखें पूरी खबरजब भी कोई मेहमान घर आता है या फिर किसी मेहमान के घर जाता है तो सबसे पहले उनको सोशल डिस्टेंसिंग से रूबरू होना पड़ता है. पहले तो उनको घर के अंदर प्रवेश नहीं कराया जाता है. सबसे पहले उनको घर के आंगन में बैठाया जाता है. उसके बाद पीतल की गोटी से पानी भरकर प्रणाम यानी जोहार किया जाता है.
 अन्य लोगों में यह देखने को नहीं मिलता है. लोग ज्यादातर हाथ मिलाते हैं या फिर गले लगते हैं.आदिवासी समुदाय के लोग मेहमान के हाथ-पैर धोकर उनको घर में प्रवेश करते हैं. यह परंपरा शादी का घर हो, जन्म में, मृत्यु में सभी में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं. जब ग्रामीण ग्रामसभा करते हैं. तो वहां भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं. इसलिए करते हैं कि लोग एक दूसरे से बातें नहीं करें और ग्रामसभा अपने सही निर्णय पर पहुंच सके. इससे यह साबित होता है कि आदिवासी समाज सोशल डिस्टेंसिंग और स्वास्थ्य के प्रति काफी पहले से जागरूक है.

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