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विश्व पर्यावरण दिवस पर एक विशेष संदेश

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विश्व पर्यावरण दिवस पर एक विशेष संदेश

पर्यावरण के सबसे बड़े हितैषी एवं रक्षक माने जाने वाले भोले-भाले आदिवासियों की गरीबी, अशिक्षा, बेकारी, पिछड़ापन व अन्य कारणों का लाभ उठाते हुए उनकी आदिम संस्कृति एवं अस्मिता को चालाक व लालची उद्योगपति और व्यापारी आज भी ठगने से बाज नहीं आते हैं। हर कदम पर आदिवासियों की कमज़ोरी का फायदा उठाते हुए उनका आर्थिक, शारीरिक व मानसिक शोषण किया जाता है।
कभी जंगल में शान की ज़िन्दगी जीने वाले आदिवासी समुदाय के लोग आज दिहाड़ी मज़दूर के रूप में कार्य करते हुए नज़र आ रहे हैं। चंद रुपयों में खुलेआम इनके श्रम की खरीद फरोख्त होती है। इन्हें इनकी भूमि और जंगल से हटाया जा रहा है।
विश्व के जंगलों में चहुंमुखी विकास के नाम पर औद्योगिकीकरण, चौड़ीकरण एवं अन्य कार्यों के लिए लगातार हो रही वनों और जंगलों की अंधाधुंध कटाई का असर आदिवासियों के जीवन पर पड़ रहा है। वर्तमान में तेज़ी से घटते जंगल और बदलते हुए पर्यावरण को बचाने के लिए सदियों से जंगलों के साथ जीवन का संबंध निभाने वाले आदिवासी एक अहम भूमिका निभाते आये हैं।
जल, जंगल और ज़मीन को परंपराओं में भगवान का दर्जा देने वाले आदिवासी बिना किसी दिखावे के जंगलों और स्वयं के अस्तित्व को बचाने में भी प्रयासरत हैं। वन संरक्षण में सबसे बड़ा योगदान यहां के आदिवासियों का है, जो परंपराओं को निभाते हुए शादी से लेकर हर शुभ कार्यों में पेड़ों को साक्षी बनाते हैं।
आदिवासियों के सामाजिक व आर्थिक जीवन में पेड़ों का अलग ही महत्व है, यह वनोपज संग्रहण से अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
वन मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है लेकिन अफसोस की बात यह है कि यह बात जानने के बाद भी मनुष्य इस जीवनदायिनी ऑक्सीजन के स्त्रोतों को नष्ट कर रहा है। मनुष्य प्राकृतिक सौंदर्य की परवाह ना करते हुए औद्योगिकीकरण, रोड चौड़ीकरण व अन्य विकास कार्यों के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई करते जा रहा है, जो पर्यावरण के लिए खतरा बन चुकी है।
लगातार हो रही वनों की कटाई से वृक्षों की संख्या कम होने के कारण पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। जनसंख्या वृद्धि, रहने के लिए भूमि की आवश्यकता, पेपर उद्योग की आपूर्ति व अन्य कई ऐसे कारण हैं, जो वनों की कटाई को बढ़ावा दे रहे हैं। इसकी वजह से आदिवासियों की जीवन-शैली पर भी विपरीत असर पड़ रहा है|विश्व के जंगलों में चहुंमुखी विकास के नाम पर औद्योगिकीकरण, चौड़ीकरण एवं अन्य कार्यों के लिए लगातार हो रही वनों और जंगलों की अंधाधुंध कटाई का असर आदिवासियों के जीवन पर पड़ रहा है। वर्तमान में तेज़ी से घटते जंगल और बदलते हुए पर्यावरण को बचाने के लिए सदियों से जंगलों के साथ जीवन का संबंध निभाने वाले हमारे अपने आदिवासी भाई बहनों की एक अहम भूमिका आज फिर से निभाने की आवश्यकता है. तो चलिए ना साथियों आज फिर से एक मुहीम मे लग जाते है और फिर से अपने जल, जंगल, जमीन की ओर अपना निसवार्थ प्रेम को दिखाते हुवे अपने संस्कृति और अपने झारखण्ड राज्य को बचाते है
जोहार , जय झारखण्ड

एंजलीन
केंद्रीय महिला उपाध्यक्ष
झारखंड आदिवासी विकास समिति

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