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‘मरांग गोमके’ थे आदिवासी अधिकारों के सच्‍चे पैरोकार

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‘मरांग गोमके’ थे आदिवासी अधिकारों के सच्‍चे पैरोकार

रांची : झारखंड की अस्मिता, इसकी पहचान को धरातल पर उतारने वाले जन्‍मजात लीडर ‘मरांग गोमके’ (ग्रेट लीडर) जयपाल सिंह मुंडा की आज 117वीं जयंती मनायी जा रही है. ‘मरांग गोमके’ का जन्‍म 3 जनवरी 1903 को रांची जिले के खूंटी जिले के टकरा गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम आमरु पाहन मुंडा था.

जयपाल सिंह पहले नेता हुए जिन्‍होंने झारखंड अलग राज्य की परिकल्पना की. उन्‍होंने ही झारखंडी की संस्कृति, अस्मिता एवं पहचान को राजनीतिक धरातल पर उतारने का काम किया. उन्‍हें पता था कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति के बाद यहां की सीधी-सादी जनता उपनिवेशवादी नीति का शिकार हो जायेगी. जल, जंगल और जमीन पर बाहर से आये लोग कब्जा जमा कर उनका शोषण और दोहन करेंगे. मरांग गोमके ने तभी से अलग झारखंड राज्य की परिकल्‍पना शुरू की दी. 

जयपाल सिंह एक ऐसे लीडर थे जो जानते थे कि कैसे लोगों को एकजूट रखा जा सकता है. कैसे टीम-संगठन तैयार किया जाता है. चाहे वो राजनीति का क्षेत्र हो या फिर खेल का मैदान हो. हर जगह उन्‍होंने अपनी लीडरशिप क्वालिटी की पहचान करायी.1928 के ओलिंपिक में अपनी कप्‍तानी में भारतीय हॉकी टीम को स्‍वर्ण पदक दिलाना हो या फिर संविधान सभा और संसद में आदिवासी हितों पर बहस की बात हो जयपाल सिंह कभी पीछे नहीं रहे. हर जगह उन्‍होंने अपनी बात दम के साथ रखी.

जयपाल सिंह मुंडा कैसे ‘मरांग गोमके’ (ग्रेट लीडर) बने ? यह इसी बात से साबित होता है कि उनकी एक आवाज में लाखों की संख्‍या में लोग एक साथ हो जाते थे. वो दूरदर्शी नेता थे. उन्‍हें मालूम था कि कैसे समाज को आगे ले जाया जा सकता है. उन्‍होंने आदिवासी हितों की बात तो जरूर की, लेकिन उन्‍होंने झारखंड के गैरआदिवासियों को भी इग्‍नोर नहीं किया, बल्कि उन्‍होंने सभी को एक साथ लेकर चला. तभी तो उन्‍होंने आदिवासी महासभा का नाम बदल कर झारखंड पार्टी रखा था.

1939 की बात है पहली बार रांची में हरमू नदी के किनारे जयपाल सिंह ने एक सभा की थी, जिसमें उन्‍होंने आदिवासी महासभा का नेतृत्‍व किया था. उस महासभा में करीब एक लाख से अधिक लोगों का महाजुटान हुआ था. यह उनके नेतृत्‍व कौशल का ही पहचान है.उन्‍होंने महासभा में भाग लेने वाले आदिवासी, गैरआदिवासियों, प्रशासन और जमीनदारों को धन्‍यवाद दिया था. मरांग गोमके ने संदेश दिया था कि झारखंड आंदोलन में किसी एक वर्ग का योगदान नहीं रहा है बल्कि सभी की समान भूमिका रही.

जयपाल सिंह ने अपनी कौशल का परिचय पढ़ाई के साथ-साथ खेल में दिखाया. स्‍कूल से ही उन्‍हें हॉकी खेलना काफी पसंद था. उनकी कला को एक अंग्रेज शिक्षक ने पहचाना और उन्‍हें रांची के संत पॉल स्‍कूल से निकालकर इंग्‍लैंड ले गया. इंग्‍लैंड में रहकर जयपाल सिंह ने न केवल उंच्‍च शिक्षा प्राप्‍त की, बल्कि 19 फरवरी 1928 को भारतीय हॉकी फेडरेशन ने उन्हें एम्सटर्डम ओलिंपिक के लिए घोषित भारतीय हॉकी टीम का कप्तान नियुक्त चुन लिया.

उन्‍होंने इस मौके का हाथ से नहीं जाने दिया और अपनी अगुआई में देश को पहली बार हॉकी में स्‍वर्ण विजेता बनाया. उनमें खेल को लेकर जुनून ही तो था कि उन्‍होंने आइसीएस बनने का जो अपना सपना था उसे भी त्‍याग दिया. दरअसल हॉकी खेलने के चलते उन्‍होंने आइसीएस का प्रशिक्षण छोड़ दिया, बाद में जब वो ओलंपिक से वापस आये तो उन्‍हें फिर से एक साल का प्रशिक्षण करने के लिए कहा गया. जिसके लिए वो राजी नहीं हुए.

खूंटी से सांसद चुन कर संसद पहुंचे

मरांग गोमके 1952 में लोकसभा चुनाव जीतकर खूंटी से सांसद बने और संसद भवन पहुंचे. उनकी पार्टी झारखंड पार्टी ने बिहार विधानसभा में 34 सीट और लासेकसभा में पांच सीट जीत कर अच्छा प्रदर्शन किया. उन्‍होंने लोकसभा में आदिवासी हितों की जमकर वकालत की. हालांकि बाद के दिनों में उन्‍हें कई मामलों में आलोचना की भी शिकार होना पड़ा था.

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