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बिरहोर परिवारों को विरासत में मिली है कारीगिरी

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बिरहोर परिवारों को विरासत में मिली है कारीगिरी

गिद्धौर

यूं तो अधिकांश घरों में खजूर से बनी झाडू व चटाइयां मिल जाएगी, लेकिन इन्हें बनाने वाले बिरहोर परिवारो को इस हुनर के साथ मुफलिसी भी मानो इन्हें विरासत में मिली हैं।

बाजार में काफी कम दामों पर बिकने वाली इस वस्तुओं का चलन कम होने व बढ़ती महंगाई के साथ इन बिरहोर परिवारो के सामने रोजीरोटी का संकट भी बढ़ता जा रहा है।

बिरहोर परिवारो ने खजूर के पत्तों से झाड़ू, हाथपंखें व चटाइयां बनाने उन्होंने अपने ही बुजुर्गों से सीखा था और उन्हें इस हूनर के अलावा कुछ नहीं आने के कारण वे जंगली शिकार व यहीं करने को मजबूर है।

बावजूद सुकून की दो जून की रोटी नसीब नहीं हो पा रही।

प्रखंड मुख्यालय क्र जपुआ में निवास करने वाले आदिम जनजाति बिरहोर परिवार को मानो यह हुनर प्राकृतिक ने दिया है।

पत्ते को गूंथकर बनाते है उत्पाद

सुधनी बिरहोरिन ने बताया कि खजूर के पत्तों से झाड़ू व चटाइयां बनाने के लिए इन्हें सुव्यवस्थित कर आपस में गूूंथा जाता है।

खिजुर के पत्तों से चटाई बनाने में दो से तीन लग जाते है।एक चटाई की कीमत 200 से 250 रुपये तक मिलता है।

जिससे आज के महंगाई के दौर में गुजारा चलाना काफी कठिन है।

फैशन के साथ बदल रहा चलन

घरों में कोटा स्टोन, मार्बल व टाइल्स व अन्य चिकने फर्श व कच्चे मकानों समेत लाल पत्थर के फर्शों का चलन होने के कारण इन्हें साफ करने के लिए खजूर के झाडू भी चलन के बाहर हो चले है।

इसी प्रकार घरों में पंखे, कूलर होने से हाथपंखों की मांग कम हो रही है। खजूर की चटाई का तो मानो चलन ही समाप्त हो चला है। इसके चलते अब खजूर की चटाइयां भी कम
ही नजर आती है।

जंगलों से बीनते है पत्ते

नैकी बिरहोरिन ने बताया की खजूर से पत्तों से बनने वाली इन वस्तुओं के लिए पूरा परिवार व बच्चे जंगल व आसपास के क्षेत्रों में खजूर के पेड़ तलाशते है तथा उससे पत्ते तोड़कर उन्हें बीनते हैं। इसके बाद महिलाएं इन पत्तों को सिर पर लादकर घर लाती है, तब जाकर उन्हें कच्चा माल मिल पाता है। खजूर के पत्तों से चटाई व झाड़ू बनाने का काम पीढियों से कर रहे हैं, लेकिन पूरी मेहनत के बावजूद रोजी-रोटी चलाना भारी पड़ रहा है।

हमें न तो किसी सरकारी योजना का लाभ मिल रहा है और न ही बाजार में माल के दाम। बावजूद रोजी-रोटी चलाना मुश्किल होता जा रहा है।

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