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छोटानागपुर  के अनेक वीर महापुरूषों ने अंग्रेजों के शोषण के विरूद्ध भारत वर्ष के स्वतंत्रता  के लिए अपने जान की कुर्बानी दी और शहीद हुए

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छोटानागपुर  के अनेक वीर महापुरूषों ने अंग्रेजों के शोषण के विरूद्ध भारत वर्ष के स्वतंत्रता  के लिए अपने जान की कुर्बानी दी और शहीद हुए

तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई. में ग्राम – मुरगू, थाना – सिसई, जिला – गुमला (बिहार) में हुआ था। तेलंगा खड़िया एक साधारण किसान के घर में जन्म लिए थे। उनके पिता का नाम हुईया खड़िया और माता का नाम पेतो खड़िया था। कहा जाता है कि तेलंगा बचपन से ही वीर साहसी और अधिक वक्ता थे। वीर, साहसी एवं अधिक बोलने वाले व्यक्ति को खड़िया भाषा में तेsबलंगा कहते हैं। संभवता तेsबलंगा से ही तेलंगा हुआ। इनका शारीर हट्ठा – कट्ठा एवं सांवले रंग का था, तथा इनका ऊंचाई 5 फीट 9 ईंच था। तेलंगा खड़िया पढ़ा- लिखा नहीं था, परंतु वह एक कर्मठ समाजसेवी नेता था। इनकी शादी सन, 1846  ई. में कुमारी रतनी खड़िया से हुई थी। तेलंगा का मुख्य पेशा खेती करना और अपने अनुयायियों को सुबह – शाम गदका, तलवार एवं तीर चलाने का कला सिखाना था। प्रत्येक कला सीखने एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ करने के पहले इस झंडा के पास पूरब मुंह करके सभी लोग (गुरू – शिष्य) घुटना टेककर धरती माता, सरना माता, सूर्य भगवान, महादान देव एवं अपने – अपने पूवर्जों का स्मरण कर पूजा एवं अराधना करते थे। सिसई का वह मैदान उन दिनों गदका, लाठी, तलवार एवं तीर चलाने के लिए चारों ओर से ग्रामीण युवक इस मैदान में इकठ्ठा होते थे।

तेलंगा के पिता ढूईया खड़िया को छोटानागपुर नागवंशी महाराजा द्वारा रातू गढ़ की ओर से ग्राम मुरगू के लिए भण्डारी नियुक्त किया गया था और वह ग्राम – मुरगू का पाहन भी था। भण्डारी का कार्य मझियस जमीन के फसल को इकट्ठा कर एवं कराकर रातू गढ़ पहुँचाना था।

अंग्रेजों के शोषण और अत्याचार से द्रवित हुए थे तेलंगा खड़िया

तेलंगा अपने पिता के साथ कभी – कभी महाराज के दरबार में जाया करता था। जिसके कारण उसे सामाजिक कार्य का साधारण ज्ञान की जानकारी प्राप्त हुई थी। उन दिनों अर्थात सन 1849 – 50 ई. में भारतवर्ष में अंग्रेजों का शासन था। अंग्रेज शासकों द्वारा इस क्षेत्र के लोगों से मनमानी कर वसूल करना आदि अत्याचार करने लगे थे। शोषण एवं अत्याचार से इस क्षेत्र की जनता उब चुकी थी, परंतु उन दिनों छोटानागपुर के लोग ही नहीं पूरे भारतवर्ष के लोगों में फूट थी, एकता नहीं था। अंग्रेजों की नीति थी – भारतियों के बीच फूट डालो और शासन करो, अंग्रेजों के शोषण एवं अत्याचार को देखकर तेलंगा खड़िया सहन नहीं कर सका और अंग्रजों के विरूद्ध लड़ाई करने के लिए तैयार हो गया। इस क्रम में तेलंगा खड़िया गाँव – गाँव जाकर एकता के लिए लोगों से संपर्क करने लगा और जगह – जगह जुरी पंचायत गठन कर लोगों के बीच अंग्रेजों से लड़ने के लिए बीज बोया। तेलंगा खड़िया छोटानागपुरके पूर्वी एवं दक्षिणी इलाके के प्रत्येक गांव में जाकर सभी वर्गों के लोग एवं धर्मी के बीच समन्वय स्थापित किये। वे सत्यवादी, ईमानदार और साहसी थे। इनका मुख्य हथियार तलवार एवं तीन – धनुष ही था। अंग्रेजों के रायफल और बन्दूक की गोली को तेलंगा तलवार से ही रोक लेते है। मानों उसे ईश्वरीय वरदान था।

जूरी पंचायत कायम करने के बाद तेलंगा के बहुत से अनुयायी हुए। इनके संगठनात्मक कार्य के बारे में अंग्रेज सरकार को पता चला, तो तेलंगा को अंग्रेज सरकार को पता चला, तो तेलंगा को अंग्रेज सरकार द्वारा पकड़ने के लिए आदेश जारी किया। जब तेलंगा को इसकी जानकारी मिली तो वे घर से बाहर रहकर ही संगठन का कार्य करने लगे। तेलंगा कभी – कभी घर आया करते थे, क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि अंग्रेज पुलिस ली तो उसे जेल जाना पड़ेगा और उनका सपना साकार नहीं हो पाएगा।

कलकत्ता जेल से छुटने के बाद तेलंगा अपना घर मुरगू आया। दूसरे दिन सुबह छः बजे सिसई मैदान (अखाड़ा) गया। अखाड़ा पर तेलंगा के अनुयायी उपस्थित थे। तेलंगा खड़िया अपने नियमानुसार तीर, तलवार, गढ़का एवं लाठी सिखाने के पहले झंडा के पास घुटना टेक एवं सिर झुकाकर धरती माता, सरना माता, सूर्य भगवान, महादान देव एवं अपने पूर्वजों का नाम लेकर प्रार्थना (पूजा) कर रहा था, उसी समय एक कुख्यात, असामाजिक प्रवृति का अंग्रेजों का दलाल, बोधन सिंह जो नजदीक के झाड़ी में छिपकर मौके की तलाश में था,बन्दुक से गोली मार दिया। तेलंगा पूजा स्थल पर ही तड़प – तड़प कर हे सरना माँ कहकर प्राण त्याग दिया। वह दिन 23 अप्रैल 1880 को हुई, परंतु अधिकतर लोगों का मानना है, की बोधन सिंह द्वारा तेलंगा खड़िया की हत्या 23 अप्रैल 1880 ई. को की गई थी।

तेलंगा खड़िया के शव को तुरंत उनके अनुयायी नजदीक के घनघोर जंगल होते हुए कोयल नदी पार कर ग्राम सोसो, नीमटोली के एक टांड में टांड में गाड़ दिए। एस तांड का नाम तेलंगा तोपा टांड के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में किसी अंग्रेज शासकों को जानकारी नहीं दी गई।

तेलंगा की मृत्यु की खबर सुनकर इलाके में सन्नाटा छा गया, लोग फुट – फुट कर रोने लगे तथा दुखभरी गीत गाने लगे। तेलंगा को बोधन सिंह द्वारा गोली मारकर हत्या किया गया, इस सम्बन्ध में अभी भी गीत गाया जाता है, एस सम्बन्ध में अभी भी गीत गाया जाता है, जो इस प्रकार है –

राजा जमींदार अंग्रेज से लड़ाई करते तेलंगा ,

इलाका के शांति करले। 1

अंग्रेज से भाड़ा लेवल बोधन सिंह,

तेलंगा के शीशा गोली से मारे। 2

तेलंगा का मुख्य प्रशिक्षण केंद्र सिसई के मैदान पर था, जहाँ आज सिसई बाजार लगता है। बोधन सिंह, ग्राम – बरगांव, थाना – सिसई, जिला – रांची, वर्तमान – गुमला (बिहार) का निवासी था, जो ग्राम – मुरगू से करीब दो मील की दूरी पर है। दुष्ट बोधन सिंह मर गया, उनका वारिस (खानदान) एक भी नहीं है।

तेलंगा का मात्र एक लड़का था, जिसका नाम जोगिया खड़िया था। तेलंगा के मारे जाने के बाद खड़िया समुदाय को लोग मुरगू गाँव में रहना पसंद नहीं किये। कुछ दिन के बाद तेलंगा परिवार एवं उनेक सहयोगी गाँव छोड़ कर सिसई थाना के ही गाँव – घाघरा चले गये, और वहीं रहने लगे, जो आज भी तेलंगा के खानदान के लोग घाघरा गाँव में पहनाई का काम कर रहे हैं।

मुरगू गाँव से जाने के पहले तेलंगा के पिता दुईया खड़िया उसी गाँव के एक उराँव जनजाति परिवार को पहनाई काम करने का जिम्मा सौंपा जिसका नाम करमु उराँव था।

कहा जाता है, की मुरगू एक पुराना गाँव है और यहाँ खड़िया जाति के लोग ही पहले आगमन किये थे। जब ग्राम – मुरगू पहान था, उस समय सरना एवं पूजा स्थल पर खड़िया भाषा से ही पूजा होती थी।

खड़िया भाषा को इस क्षेत्र में देव भाषा कहा जाता है। पहनाई कार्य एवं पूजा पाठ के लिए उराँव जनजातीय समुदाय को जिम्मा दिया गया तो उराँव पहान वर्ष में एक बार खड़िया पहान को ग्राम घाघरा, थाना सिसई से पूजा के लिए आवश्यक समझ कर बुला कर लाता था। पूजा होती थी, और गाँव के सभी वर्ग के लोग खुशहाल रहते थे।

इस प्रकार उपयोक्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि तेलंगा खड़िया एक वीर एवं साहसी महापुरुष थे, जिन्होंने अंग्रेजों, जमींदारों के शोषण तथा अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अंग्रेज शासन से मुक्ति तथा देश के स्वतंत्रता के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी ऐसे महापुरुष को नमन प्रणाम।

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