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‘‘आदिवासीज एंड देयर फोरेस्ट’’ पुस्तक का विमोचन

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‘‘आदिवासीज एंड देयर फोरेस्ट’’ पुस्तक का विमोचन

रांची के सौजन्य से झारखंड के आदिवासी एक्टिविस्ट लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग की चौथी अंग्रेजी पुस्तक ‘‘आदिवासीज एंड देयर फोरेस्ट’’ का विमोचन समाज विकास केन्द्र, रांची में चाल्र्स डार्विन के परपोते जानेमाने मानवशास्त्री व लेखक डॉ. फेलिक्स पडेल किया। इस पुस्तक का प्रस्तावना डॉ. फेलिक्स पडेल ने लिखा है। इसके अलावा जानेमाने समाजशास्त्री डॉ. वर्जिनियुस खाखा, मानवशास्त्री डॉ. माईकल यॉर्क, पर्यावरण इतिहासकार डॉ. विनिता दामोदरण, एक्टिविस्ट सिने लेथ एवं थेओदोर रैथ ने पुस्तक का अनुमोदन किया है। यह पुस्तक 8 पेज रंगीन तस्वीरों के साथ कुल 328 पृष्ठों का है, जिसकी कीमत मात्र 300 रूपये है। इस पुस्तक को आदिवासी पब्लिकेशन्स, रांची ने प्रकाशित किया है।

इस अवसर पर बोलते हुए डॉ. फेलिक्स पडेल ने कहा कि यह पुस्तक आदिवासी और जंगल को लेकर ऐतिहासिक एवं वर्तमान परिस्थिति का एक सारंश प्रस्तुत करता है। आज पूरी दुनिया में आदिवासियों के पास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की होड़ मची हुई है। एकवाडोर, कोलम्बिया, ब्राजील और पेरू की सरकारनें वहां के आदिवासियों को जंगलों से बेदखल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं तो वहीं भारत में भी आदिवासियों को वन एवं वन्य जीवन का दुश्मन बताकर उनसे अपनी जमीन, पारंपरिक बसाहट और जंगल छीनने का काम जारी है।

उन्होंने कहा कि आज विकास के नाम पर जो भी किया जा रहा है वह विनाश है, जिसका परिणाम जलवायु संकट के रूप में हमें मिला है। यह संकट पूंजीपति और सरकारों के गठजोड़ का परिणाम है, जिन्होंने अपने फायदे के लिए विकास एवं आर्थिक तरक्की का टैग लगाकर प्राकृतिक संसाधनों को लूटा है। जलवायु संकट से बचने के लिए जंगलों को बचाना ही एकमात्र उपाय रह गया है और आदिवासियों के बगैर जंगलों को बचाया नहीं जा सकता है। इसलिए आदिवासियों को जंगलों का मालिकाना हक दीजिये, जिससे आदिवासी, जंगल और पूरा मानव सभ्यता सुरक्षित होगा। ‘‘संरक्षण’’, ‘‘सुरक्षा’’ एवं ‘‘संवर्धन’’ जैसे शब्दों की उत्पति से वर्षों पहले आदिवासी पारंपरिक तरीके से जंगलों की सुरक्षा, संरक्षण एवं संवर्धन करते आये हैं। हकीकत यह है कि वे वन एवं वन्यजीवन के दुश्मन नहीं हैं बल्कि वे ही जंगलों के असली संरक्षक हैं। इसलिए जंगल का मालिकाना हक उनको दिया जाना चाहिए।

झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बसु माल्लिक ने कहा कि हमें जंगल को आदिवासी और आदिवासी महिला के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। जंगल को अर्थशास्त्री एवं संरक्षणवादियों के दृष्टिकोण से देखने कारण ही यह समस्या उत्पन्न हुई है। साम्राज्यवादी भूख के कारण आज खनन कार्य तेज किया जा रहे हैं, जिससे जंगलों का विनाश हो रहा है। यह पुस्तक आपको जंगल को लेकर एक सम्पूर्ण जानकारी एक जगह उपलब्ध कराता है।

पुस्तक के लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि यह पुस्तक आदिवासी और जंगल की अवधारणा, संबंध एवं महत्व पर गहराई से प्रकाश डालती है। पुस्तक में सरकार की उत्पति से लकर अबतक आदिवासियों से छीनकर जंगलों को कब्जा करने के लिए बनाये गये नीति एवं नियमों पर विस्तार से चर्चा किया गया है। यह पुस्तक वन अधिकार कानून 2006 की जमीनी हकीकत को परत-दर-परत खोलकर रख देती है। इस पुस्तक में कई केस स्टडीज हैं, जो यह साबित करते हैं कि खनिज सम्पदा का दोहन करने के लिए ही आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों को वन अधिकार नहीं दिया जा रहा है। पुस्तक में कई गंभीर सवाल उठाये गये हैं।

कवयित्री ज्योति लकड़ा ने ब्रिटिशकालीन वन कानूनों को दोहनकारी बताया। उन्होंने कहा कि हमारे पुरखे मूर्ख थे क्या कि जंगल और नदी बचाये? इस अवसर पर महेन्द्र पीटर तिग्गा, मेरी क्लाउडिया सोरेंग, सुनील मिंज ने भी अपनी बातें रखी। ज्ञानचं कलुंडिया ने स्वागत भाषण एवं दीपक दिया एवं दीपक बाड़ा ने धन्यवाद ज्ञापन किया जबकि राकेश रोशन किड़ो ने कार्यक्रम का संचालन किया।

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