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असम में नागरिकता संशोधन बिल का विरोध

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असम में नागरिकता संशोधन बिल का विरोध

असम में नागरिकता संशोधन बिल, जो अब कानून बन चुका है, का विरोध हो रहा है और विरोध के केंद्र में हैं आदिवासी. उन्हें लगता है कि उनकी भाषा, संस्कृति और पहचान खतरे में है. प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के छात्र भी सड़कों पर उतर आये हैं, कर्फ्यू के बावजूद सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं.

भारत में रहने वाली विशाल आबादी को मोटे तौर पर दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- आर्य और अनार्य, गैर आदिवासी और आदिवासी. भारत के किसी भी हिस्से के जंगलों में, पर्वतीय अंचलों में चले जाईये, अपनी नीरवता में जीते किसी न किसी आदिवासी समुदाय के लोग आपको मिल जायेंगे. कम से कम 200 किस्म की भाषायें ये बोलते हैं. इनके रूप रंग में भी भिन्नता है. कुछ मलय मूल से मिलते जुलते हैं. कुछ चीनी मूल के लोगों से मिलते जुलते हैं. इनके बारे में आज हमारे पास पहले से ज्यादा जानकारी है, लेकिन आज भी वे एक धुंध में लिपटे नजर आते है.

इन्हीं जनजातीय समुदाय में से एक हैं बोडो जो असम में बसने वाले सबसे पुराने वाशिंदे हैं. इतिहासकारों के अनुसार सदियों पहले तिब्बत होते हुए ये ब्रह्मपुत्र घाटी में पहुंचे और पूर्वी हिमालय के संपूर्ण तराई क्षेत्र, जिसमें असम, त्रिपुरा, नार्थ बंगाल और आज के बांगलादेश के कुछ हिस्सों- में बस गये. ये तिब्बत वर्मीज भाषा परिवार की एक भाषा बोलते हैं. ये एनिमिस्ट परंपरा के लोग थे लेकिन अब हिंदू है. उसी तरह जैसे झारखंड के आदिवासी भी हिंदू. इनके पास अपनी लिपि थी जो संरक्षण के अभाव में खत्म हो गई. प्रारंभ में उन्होंने लैटिन और बंगाली लिपि को अपनाया. अब देवनागरी में लिखते हैं.

इसी समुदाय ने अपने इलाके में धान के खेत तैयार किये, चाय के बगान लगाये लेकिन उतना ही जितने की उनकी जरूरत थी. इसके अलावा ये सिल्क पैदा करने वाला कीड़ा पालते हैं. हर घर में एक करघा जरूर होता है. अपना बुना कपड़ा वे पहनते हैं. चावल से बनी एक किस्म की शराब बनाते और पीते हैं और बांस के सामान बनाते हैं. पहाड़ी अंचलों में जीवन कठिन होता है. उंचे नीचे रास्तों से होकर इंधन के लिए लकड़ी जुटाना. ढलानों पर खेती. जंगल पर निर्भरता. सामूहिक श्रम और आनंद वाली संस्कृति.

लेकिन आवागमन की सुविधा बढने के साथ इस क्षेत्र में बिहरागतों का प्रवेश हुआ. आजादी के बाद प्रखंड इकाई तक सरकारी कार्यालय बने. विकास के साथ सुदूर इलाकों में सरकारी अमले, अधिकारी, अभियंता, ओवरसीयर, ठेकेदार, जमादार आदि भी पहुंचे. बहिरागतों की संख्या बढती गई. दुकानें, बाजार पसरते गये. इसके अलावा रोजगार की तलाश में पहुंचे अन्य इलाकों के लोगों से आबादी का संतुलन बिगड़ने लगा. तथाकथित विकास के साथ लिपटी बिमारियां तो पसरती गई लेकिन विकास का लाभ नहीं मिला यहां के लोगों को. शैक्षणिक संस्थानों में बोडो छात्रों की संख्या गिनती के. सरकारी नौकरियों में आरक्षित पद भी खाली रह जाते. क्षेत्रीय असंतोष भड़केने लगा.

बांगलादेश के मुक्ति संग्राम के दिनों में भारी संख्या में बांगलादेशी मुसलमानों का इस क्षेत्र में प्रवेश हुआ. सरकारी रेकार्डों के अनुसार कम से कम तीन करोड़ बांगलादेशी मुसलमान आज देश में हैं. इसका बड़ा हिस्सा पूर्वोत्तर राज्यों में ही सिमटा हुआ है. हम बांगलादेशी मुसलमानों को इन सब के लिए दोषी नहीं ठहरा सकते. वे इतिहास और समय के मारे गये लोग हैं. उनमें से बहुसंख्यक कभी दलित पिछड़े हिंदू ही थे जो अगड़ी जाति के हिंदुओं के उत्पीड़न का शिकार हो कर मुसलमान बन गये. आजादी के वक्त देश का विभाजन हुआ और वे दर बदर हो गये. बांगलादेश के गठन के वक्त एक बार फिर उन पर गाज गिरी और वे भारी संख्या में शरणार्थी बन कर भारत में चले आये जो कभी उनका भी देश था. उनमें से अधिकांश अब भारत में ही रहते हैं.

लेकिन इन सबका खामियाजा उत्तर पूर्व की जनजातीय आबादी पर ही पड़ा. 1980 में उपेंद्रनाथ ब्रह्मा के नेतृत्व में बोडो आंदोलन शुरु हुआ. एक दशक के लंबे संघर्ष के बाद बोडोलैंड टेरीटोरियल कौंशिल का गठन हुआ. लेकिन हकीकत यह है कि इन सबके बावजूद बोडो आबादी का अनुपात कम होता जा रहा है. उनकी जमीन उनसे छिनती जा रही है. उनकी संस्कृति, उनकी जातीय अस्मिता मिटती जा रही है. हिंदू धर्म से उनका कोई वास्ता नहीं था. लेकिन आज ऐनिमिस्ट ट्रेडीसन से पूजापाठ करने वाले लोग वहां गिनती के रह गये हैं. सबसे बड़ी बात यह कि उनमें महाजनी व्यवस्था में जीने की बुद्धिमत्ता नहीं. इसलिए वे पिछड़ते जा रहे हैं. हमारा लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली का मूलाधार संख्या बल है. अब जब उनकी आबादी का अनुपात ही घटता जा रहा है तो धीरे धीरे मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था ही उनके लिए बेमतलब बन कर रह जाने वाली है. यही असुरक्षा की भावना, अस्तित्व मिटने का भय निर्णायक संघर्ष के लिए उन्हें प्रेरित कर रही है.

हमारे बहुत सारे मित्रों और बुद्धिजीवियों को इस बात से ही आश्चर्य होता है कि आजाद भारत में आप किसी को देश के किसी हिस्से में जाने और बसने से कैसे रोक सकते हैं? लेकिन कोई न कोई हद तो मुकर्रर करनी ही पड़ेगी. क्या आप आक्रामक और विकसित संभ्यता-संस्कृति को अविकसित और भिन्न सभ्यता संस्कृति को लील जाने की छूट देंगे? इतिहास में यह सब होता रहा है. लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी क्या सर्वाइवल ऑफ दी फिटेस्ट का ही सिद्धांत चलेगा?

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